मोजतबा खामेनेई का सख्त संदेश और मध्य पूर्व में बदलती जंग की हकीकत

मोजतबा खामेनेई का सख्त संदेश और मध्य पूर्व में बदलती जंग की हकीकत

ईरान की सत्ता के गलियारों में जब मोजतबा खामेनेई कुछ कहते हैं, तो उसकी गूँज सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं रहती। हाल ही में उन्होंने जो रुख अपनाया है, उसने साफ कर दिया है कि ईरान झुकने के मूड में बिल्कुल नहीं है। उन्होंने सीधे शब्दों में कह दिया कि जब तक अमेरिका और इजरायल घुटने नहीं टेक देते, तब तक यह जंग रुकने वाली नहीं है। यह बयान सिर्फ एक धमकी नहीं है, बल्कि उस गहरी रणनीति का हिस्सा है जिसे ईरान दशकों से बुन रहा है।

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मोजतबा का प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। कई लोग उन्हें भविष्य के उत्तराधिकारी के तौर पर देखते हैं। जब ऐसा कोई व्यक्ति युद्ध को लेकर इतनी कट्टर लाइन खींचता है, तो इसका मतलब है कि कूटनीति के दरवाजे फिलहाल बंद हो चुके हैं। वे किसी समझौते की बात नहीं कर रहे। वे जीत की बात कर रहे हैं, और वह भी ऐसी जीत जिसमें सामने वाला पूरी तरह पस्त हो जाए।

इजरायल और अमेरिका के लिए ईरान का नया गेमप्लान

ईरान की रणनीति अब केवल बचाव की नहीं रह गई है। पिछले कुछ महीनों में जिस तरह से लेबनान, गाजा और यमन के मोर्चों पर तनाव बढ़ा है, उसने ईरान को एक आक्रामक रुख अपनाने का मौका दे दिया है। मोजतबा खामेनेई का यह कहना कि 'दुश्मन के घुटने टेकने तक जंग जारी रहेगी', असल में उनके 'प्रॉक्सि' नेटवर्क को एक सीधा सिग्नल है। इसमें हिजबुल्लाह, हमास और हूती विद्रोही शामिल हैं।

ईरान जानता है कि वह सीधे तौर पर अमेरिका से पारंपरिक युद्ध नहीं जीत सकता। इसलिए उसकी पूरी ताकत 'अट्रीशन वॉर' यानी दुश्मन को थका देने वाली जंग पर टिकी है। वे चाहते हैं कि इजरायल आर्थिक और मानसिक रूप से इतना टूट जाए कि वह खुद पीछे हटने पर मजबूर हो जाए। अमेरिका के लिए संदेश और भी कड़वा है। ईरान उसे यह एहसास कराना चाहता है कि मध्य पूर्व में उसकी मौजूदगी की कीमत अब बहुत भारी पड़ने वाली है।

सत्ता का उत्तराधिकार और मोजतबा का बढ़ता कद

अक्सर लोग सवाल पूछते हैं कि मोजतबा खामेनेई ही क्यों? जवाब उनकी सक्रियता में है। वे पर्दे के पीछे रहकर ईरान की इंटेलिजेंस और सैन्य ऑपरेशन्स में बड़ा दखल रखते हैं। उनके इस हालिया बयान ने उन चर्चाओं को और हवा दे दी है कि वे अब खुलकर नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। ईरान की घरेलू राजनीति में भी यह एक बड़ा दांव है। कट्टरपंथियों को एकजुट करने के लिए इजरायल विरोध से बड़ा कोई हथियार नहीं है।

जब देश के भीतर आर्थिक पाबंदियों की वजह से जनता परेशान हो, तब बाहरी दुश्मन का डर दिखाकर राष्ट्रवाद को जगाना पुरानी तरकीब है। मोजतबा इसी रास्ते पर चल रहे हैं। वे खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश कर रहे हैं जो पश्चिमी ताकतों के सामने न झुकता है और न ही डरता है। यह तेवर उन्हें ईरान के भीतर उन लोगों के बीच लोकप्रिय बनाता है जो मानते हैं कि उदारवाद ने देश को कुछ नहीं दिया।

क्षेत्र में बढ़ता परमाणु खतरा

मोजतबा के बयानों के पीछे एक और बड़ा डर छिपा है। वह है ईरान का परमाणु कार्यक्रम। अगर ईरान यह मान चुका है कि युद्ध तभी रुकेगा जब दुश्मन हार मान ले, तो वह अपने सबसे घातक हथियार को तैयार करने में पूरी ताकत लगा देगा। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की रिपोर्टें पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि ईरान यूरेनियम संवर्धन के उस स्तर के करीब है जहाँ से बम बनाना आसान हो जाता है।

अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो ईरान के पास 'न्यूक्लियर डिटरेंस' का कार्ड खेलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। इजरायल इस बात को अच्छी तरह समझता है। इसीलिए वह ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले की योजना बनाता रहता है। यह एक ऐसा खतरनाक चक्र है जिसमें एक भी गलत कदम पूरी दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की तरफ धकेल सकता है।

क्या वाकई घुटने टेकेंगे अमेरिका और इजरायल

यह दावा करना कि अमेरिका जैसी महाशक्ति घुटने टेक देगी, सुनने में थोड़ा फिल्मी लग सकता है। लेकिन यहाँ 'घुटने टेकने' का मतलब पूरी तरह आत्मसमर्पण नहीं है। ईरान चाहता है कि अमेरिका मध्य पूर्व से अपना बोरिया-बिस्तर समेट ले। वह चाहता है कि इजरायल अपनी विस्तारवादी नीतियों को छोड़ दे और फिलिस्तीन के मुद्दे पर पूरी तरह पीछे हट जाए।

इतिहास गवाह है कि वियतनाम और अफगानिस्तान में अमेरिका को भारी नुकसान उठाकर पीछे हटना पड़ा था। ईरान इसी इतिहास को दोहराना चाहता है। उसे लगता है कि अगर वह इजरायल को लंबे समय तक अस्थिर रख पाया, तो अमेरिकी जनता खुद अपनी सरकार पर दबाव बनाएगी कि वे इस लड़ाई से बाहर निकलें।

मध्य पूर्व की बदलती भू-राजनीति

सिर्फ ईरान ही नहीं, बल्कि सऊदी अरब और यूएई जैसे देश भी इस खेल को बड़े गौर से देख रहे हैं। एक समय था जब अरब देश इजरायल के साथ रिश्ते सुधार रहे थे। लेकिन गाजा युद्ध और फिर ईरान के कड़े रुख ने इन समीकरणों को बिगाड़ दिया है। अब कोई भी अरब देश खुलकर इजरायल के साथ खड़ा होने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है।

ईरान की कूटनीति यहाँ सफल होती दिख रही है। उसने खुद को इस्लामी जगत के इकलौते रक्षक के रूप में पेश कर दिया है। मोजतबा खामेनेई का बयान इसी नैरेटिव को मजबूत करता है। वे दुनिया को बताना चाहते हैं कि जब बाकी सब चुप थे, तब ईरान ही था जो आँखों में आँखें डालकर बात कर रहा था।

💡 You might also like: The Long Walk to the Gilded Table

युद्ध के मैदान की कड़वी सच्चाई

जमीनी हकीकत यह है कि युद्ध में जीत किसी की नहीं होती। अगर ईरान अपनी जिद पर अड़ा रहा और इजरायल ने अपने हमले तेज किए, तो नुकसान सिर्फ आम जनता का होगा। लेबनान की बर्बादी और गाजा का मंजर इसका सबूत है। मोजतबा के शब्दों में जो सख्ती है, वह युद्ध के मैदान में खून बनकर बहती है।

ईरान के पास मिसाइलों का बड़ा जखीरा है, यह सच है। लेकिन इजरायल का 'आयरन डोम' और 'एरो' डिफेंस सिस्टम भी कम नहीं है। यह तकनीक और जज्बे की ऐसी लड़ाई बन गई है जिसका अंत फिलहाल नजर नहीं आता। जब तक दोनों पक्ष अपनी शर्तों पर अड़े रहेंगे, तब तक शांति की कोई भी कोशिश नाकाम ही साबित होगी।

ईरान के भीतर भी मोजतबा के इस रुख को लेकर दो फाड़ हैं। युवा पीढ़ी जो बदलाव चाहती है, उसे लगता है कि इस तरह के बयान देश को और ज्यादा अलग-थलग कर देंगे। वहीं, रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) जैसे संगठन मोजतबा की इस सोच को पूरी तरह सपोर्ट करते हैं। उनके लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है।

आगे की राह बेहद कठिन है। अगर आप इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखना चाहते हैं, तो आपको केवल बयानों पर नहीं बल्कि बॉर्डर पर हो रही हलचल को समझना होगा। ईरान के अगले कदम उसकी मिसाइल टेस्टिंग और सीरिया-लेबनान में बढ़ती सक्रियता से साफ होंगे। पश्चिमी मीडिया के दावों और ईरान के सरकारी बयानों के बीच की सच्चाई को परखने के लिए स्वतंत्र स्रोतों और ग्राउंड रिपोर्टिंग पर भरोसा करना जरूरी है। इस तनावपूर्ण माहौल में कूटनीतिक गलियारों से ज्यादा हलचल अब मिलिट्री कमांड सेंटरों में हो रही है।

EN

Ethan Nelson

Ethan Nelson is an award-winning writer whose work has appeared in leading publications. Specializes in data-driven journalism and investigative reporting.