चीन ने ताइवान के चारों तरफ अपनी मिलिट्री एक्टिविटी को जिस आक्रामक स्तर पर पहुंचा दिया है, वह सिर्फ एक सामान्य सैन्य अभ्यास नहीं है। बीजिंग अब ताइवान को डराने के चरण से आगे निकलकर सीधे कब्जे की रिहर्सल कर रहा है। ड्रैगन की इस बढ़ती आक्रामकता ने वाशिंगटन में खतरे की घंटी बजा दी है। अमेरिका अब चुप बैठने के मूड में नहीं है। बाइडन प्रशासन ने साफ कर दिया है कि अगर चीन ने कोई भी दुस्साहस किया, तो अमेरिकी सेना मूकदर्शक नहीं बनी रहेगी।
इस पूरे तनाव को केवल न्यूज हेडलाइंस के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। आपको समझना होगा कि ताइवान स्ट्रेट में असल खेल क्या चल रहा है। चीन अपनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के जरिए ताइवान को चारों तरफ से घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को भनक लग चुकी है कि यह घेराबंदी किसी भी वक्त वास्तविक हमले में बदल सकती है। इसी वजह से पेंटागन ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक तैनाती को दोगुना कर दिया है।
ताइवान स्ट्रेट में चीन की खतरनाक चालें
बीजिंग की रणनीति अब बिल्कुल साफ है। वे ताइवान को मानसिक और सैन्य रूप से थका देना चाहते हैं। हाल के महीनों में चीनी लड़ाकू विमानों और युद्धपोतों ने ताइवान के एयर डिफेंस आइडेंटिफिकेशन जोन (ADIZ) और समुद्री सीमाओं का रिकॉर्ड तोड़ उल्लंघन किया है। चीनी नौसेना के विमानवाहक पोत लगातार ताइवान के पूर्वी तट के पास युद्धाभ्यास कर रहे हैं। यह वह इलाका है जहां से अमेरिकी मदद ताइवान तक पहुंच सकती है। चीन इसी रास्ते को ब्लॉक करना चाहता है।
सैन्य विशेषज्ञ बताते हैं कि चीन का यह अभ्यास असल में एक 'ब्लॉकैड' यानी पूर्ण नाकेबंदी की तैयारी है। वे ताइवान को दुनिया से पूरी तरह काट देना चाहते हैं। अगर चीन ताइवान के कमर्शियल शिपिंग रूट्स और हवाई रास्तों को बंद करने में कामयाब रहा, तो बिना एक भी गोली चलाए इस द्वीपीय देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर देगा। ताइवान की पूरी ताकत उसकी ग्लोबल सप्लाई चेन पर टिकी है। सेमीकंडक्टर चिप्स बनाने वाली कंपनी TSMC इसी ताइवान में है। अगर इस पर आंच आई, तो पूरी दुनिया की टेक इंडस्ट्री ठप हो जाएगी।
अमेरिका की जवाबी रणनीति और रेड लाइंस
जब बात ताइवान की रक्षा की आती है, तो अमेरिका लंबे समय से 'स्ट्रेटेजिक एंबिग्यूटी' यानी रणनीतिक अस्पष्टता की नीति पर चलता रहा है। इसका मतलब था कि अमेरिका कभी खुलकर नहीं कहता था कि वह हमले की स्थिति में ताइवान को बचाने आएगा या नहीं। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कई बार खुले तौर पर कहा है कि चीन के आक्रमण की स्थिति में अमेरिकी सैनिक ताइवान की रक्षा करेंगे।
पेंटागन ने ताइवान को हथियारों की सप्लाई तेज कर दी है। इसमें एंटी-शिप मिसाइलें, वायु रक्षा प्रणालियां और एडवांस्ड सर्विलांस इक्विपमेंट शामिल हैं। अमेरिका सिर्फ खुद आगे नहीं आ रहा, बल्कि वह अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को भी लामबंद कर रहा है। जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अब खुलकर ताइवान जलडमरूमध्य में शांति बनाए रखने की वकालत कर रहे हैं। जापान के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल अमेरिकी सेना ताइवान की मदद के लिए कर सकती है, जो चीन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है।
क्या वाकई युद्ध होने वाला है
हर कोई यही सवाल पूछ रहा है। सच तो यह है कि शी जिनपिंग ने अपनी सेना को 2027 तक ताइवान पर नियंत्रण हासिल करने के लिए तैयार रहने का निर्देश दे रखा है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि युद्ध तय है। चीन जानता है कि ताइवान पर सीधा हमला करना बेहद मुश्किल काम है। ताइवान की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहां समंदर के रास्ते सेना उतारना किसी भी फौज के लिए दुःस्वप्न जैसा होगा। ताइवान के पास अपनी मजबूत डिफेंस लाइन है और उसके पहाड़ चीनी सेना के लिए काल बन सकते हैं।
इसके अलावा, आर्थिक मोर्चे पर चीन भारी नुकसान नहीं उठा सकता। ताइवान पर हमले का मतलब होगा अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा चीन पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाना। चीन की इकॉनमी पहले से ही रियल एस्टेट संकट और धीमी ग्रोथ से जूझ रही है। ऐसे में एक लंबा खिंचने वाला युद्ध कम्युनिस्ट पार्टी के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है।
भारत के लिए इस तनाव के मायने
भारत इस पूरे घटनाक्रम को बेहद बारीकी से देख रहा है। अगर ताइवान स्ट्रेट में युद्ध भड़कता है, तो चीन का पूरा ध्यान अपनी पूर्वी सीमा पर केंद्रित हो जाएगा। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन अपनी हरकतों से ध्यान भटकाने के लिए वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भी तनाव बढ़ा सकता है। भारत के लिए रणनीतिक रूप से जरूरी है कि वह हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति को मजबूत रखे ताकि चीन पर दबाव बनाया जा सके।
ग्लोबल ट्रेड के लिहाज से भी भारत अछूता नहीं रहेगा। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल सेक्टर काफी हद तक ताइवान से आने वाली चिप्स पर निर्भर हैं। सप्लाई चेन में जरा सी भी रुकावट भारतीय मैन्युफैक्चरिंग को पटरी से उतार सकती है। इसीलिए भारत अब घरेलू स्तर पर सेमीकंडक्टर मिशन को तेजी से आगे बढ़ा रहा है ताकि किसी भी वैश्विक संकट के असर को कम किया जा सके।
इस भू-राजनीतिक शतरंज में ताइवान सिर्फ एक मोहरा नहीं है, बल्कि यह ग्लोबल पावर बैलेंस का केंद्र बिंदु बन चुका है। ड्रैगन की हर चाल पर नजर रखना और अपनी तैयारियों को पुख्ता करना ही अब एकमात्र रास्ता बचा है।